इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को तीन महीने के भीतर ग्राम पंचायत चुनाव कराने का बड़ा निर्देश दिया है। कोर्ट के आदेश के अनुसार, जब तक नए चुनाव संपन्न नहीं हो जाते, तब तक सभी निवर्तमान ग्राम प्रधान प्रशासक के रूप में अपने पदों पर कार्य करते रहेंगे. यह फैसला न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की डिवीजन बेंच ने खुली अदालत में सुनाया. यह याचिका प्रयागराज के इम्तियाज हुसैन और अन्य द्वारा समय पर चुनाव कराने की मांग को लेकर दायर की गई थी.
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🏛️ हाईकोर्ट का फैसला और मुख्य निर्देश
• समय सीमा: अदालत ने स्पष्ट रूप से उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को 3 महीने के भीतर चुनावी प्रक्रिया पूरी करने को कहा है.
• कार्यकाल व्यवस्था: नए चुनाव होने तक वर्तमान ग्राम प्रधान ही प्रशासक के रूप में अपना कामकाज संभालते रहेंगे.
• OBC आरक्षण पर रुख: कोर्ट ने साफ किया कि पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग अपना काम जारी रखेगा, लेकिन चुनाव प्रक्रिया इस रिपोर्ट के आने पर निर्भर नहीं रहेगी। चुनाव मौजूदा नियमों और तय 27% आरक्षण प्रावधानों के तहत ही कराए जाएंगे.
⚠️ सरकार के सामने चुनौतियां: अभी चुनाव कराना क्यों है मुश्किल?
नियमानुसार पंचायत सीटों पर आरक्षण तय करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण होती है. चूंकि यह रिपोर्ट अभी तक लंबित है, इसलिए सरकार का मानना है कि इसके बिना चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाना कानूनी और प्रशासनिक रूप से पेचीदा हो सकता है, इस मामले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में भी अलग से सुनवाई चल रही है, जहां सरकार पहले ही चुनाव टलने और प्रशासकों की नियुक्ति को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है, प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों के अनुसार, प्रदेश में निर्धारित समय पर होने वाले विधानसभा चुनाव सरकार की पहली प्राथमिकता हैं. माना जा रहा है कि विधानसभा चुनावों के संपन्न होने के बाद ही पंचायत चुनावों की प्रक्रिया को गति मिल पाएगी.
⚖️ आगे क्या? कानूनी अपील की संभावना
इन प्रशासनिक अड़चनों, अधूरी तैयारियों और OBC सर्वे में लगने वाले समय को देखते हुए राज्य सरकार फिलहाल तुरंत चुनाव कराने की स्थिति में नहीं दिख रही है. सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस फैसले की कानूनी बारीकियों का अध्ययन कर रही है और इसके खिलाफ अदालत में अपील (ऊपरी अदालत या पुनर्विचार याचिका) करने का रुख कर सकती है.
